पत्थलगांव का बिजापारा: 100 साल पुराना गांव, आज भी सड़क के लिए तरस रहा है इंसान!आश्वासनों की कीचड़ में धंसी बिजापारा की पगडंडी, पैदल चलना भी बना सजा
सम्पादक श्याम नारायण गुप्ता
पत्थलगांव/ नक्शे में तो बिजापारा है, धरातल पर नहीं। ग्राम पंचायत कछार का यह आश्रित गांव पिछले 100 सालों से भारत के विकास की कहानी को मुंह चिढ़ा रहा है।
यहां सड़क नहीं, एक किस्सा है… एक पगडंडी, जो बरसात में तालाब बन जाती है और गर्मी में खेत की मेड़। यहां गाड़ी तो सपना है, लोग पैदल भी गिरते-संभलते चलते हैं।
100 साल… जी हां, सौ साल से ज्यादा पुरानी इस बस्ती में यादव, उरांव समाज के सैकड़ों परिवार बसे हैं। पीढ़ियां आ गईं, पीढ़ियां चली गईं, पर सड़क नहीं आई।
ग्रामीणों ने दरवाजा नहीं छोड़ा – जनपद में गुहार लगाई, शिविर में अर्जी दी, विधायक जी के बंगले तक गए। मिला क्या? हर बार एक नया आश्वासन, एक नई तारीख। फाइलें दौड़ीं, नेता बदले, पर बिजापारा की किस्मत नहीं बदली।
आज जब हमारे संवाददाता खुद उस रास्ते पर उतरे तो समझ आया कि विकास के दावे कितने खोखले हैं। खस्ताहाल रास्ते की तस्वीरें देखकर संवाददाता ने खुद जनपद पंचायत के नए सीईओ को फोन लगाया और फोटो भेजकर कहा – “साहब, एक बार आंख खोलकर देख लीजिए, आपके जिले का यह गांव आज भी 100 साल पीछे है।”
अब देखना यह है कि नए सीईओ साहब की आंखें खुलती हैं या यह फाइल भी पुरानी फाइलों के साथ धूल खाएगी। बिजापारा के लोग अब भी एक ही सवाल पूछ रहे हैं – आखिर पक्की सड़क का इंतजार कब खत्म होगा?









